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सिक्किम में कड़ाके की ठंड, छांगू में माइनस दो और नाथुला में माइनस पांच डिग्री

दैनिक आयाम न्यूज़ डेस्क

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सिक्किम में सर्दी का असर तेज़ी से बढ़ रहा है। छांगू में तापमान माइनस दो डिग्री तक गिरा, जबकि नाथुला में यह माइनस पांच डिग्री तक पहुँचा।

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, दोनों क्षेत्रों में ठंड के कारण दैनिक जीवन में कठिनाइयाँ बढ़ रही हैं, और लोगों को अतिरिक्त गर्म कपड़े और हीटिंग की आवश्यकता महसूस हो रही है।

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देश स्तर का यह घटनाक्रम आम नागरिकों, राज्यों और नीतियों पर असर डाल सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने 27 साल पुराने फैसले के आधार पर राज्यों को अतिरिक्त बिक्री कर लगाने का अधिकार बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह पुष्टि की कि राज्यों को अतिरिक्त बिक्री कर या सरचार्ज लगाने का अधिकार संविधान के 1974 के पूर्वनिर्णय के अनुसार वैध है। यह फैसला सात-जजों की संविधान पीठ द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया, जिसकी अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत ने की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1974 के "एस कोदार बनाम केरल राज्य" के फैसले में स्थापित सिद्धांत अभी भी प्रभावी हैं। उस निर्णय में कहा गया था कि अतिरिक्त बिक्री कर मूल रूप से बिक्री कर की दर में वृद्धि है, न कि डीलरों की आय पर नया कर। इस आधार पर, राज्य विधायिकाओं को मौजूदा बिक्री कर के प्रतिशत के रूप में अतिरिक्त कर या सरचार्ज निर्धारित करने की वैधानिक शक्ति प्राप्त है। सात-जजों की पीठ में सीजेआइ सूर्यकांत के अलावा जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, जस्टिस एस.वी. भट्टी, जस्टिस जोयमल्या बागची, जस्टिस एन.वी. अंजारिया, जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। उन्होंने कहा कि वैधानिक प्रावधानों में हुए संशोधनों और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के कार्यान्वयन के बाद इस मुद्दे को पुनः विचार करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अब मुख्यतः सैद्धांतिक विवाद बन चुका है। विवाद की जड़ ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5ए में निहित थी, जिसके तहत निश्चित टर्नओवर वाले डीलरों पर 10 से 15 प्रतिशत तक अतिरिक्त कर लगाया जाता था। याचिकाकर्ताओं ने यह प्रश्न उठाया था कि क्या यह कर राज्य की सातवीं अनुसूची की द्वितीय सूची की प्रविष्टि 54 के तहत वैध है, या यह आय पर कर के रूप में संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया कि 2017 में जीएसटी व्यवस्था के लागू होने के बाद यह मुद्दा केवल शैक्षणिक स्तर पर ही रह गया है, क्योंकि जीएसटी ने कई पूर्व कर प्रावधानों को समाहित कर लिया है। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सैद्धांतिक रूप से समाप्त कर दिया, जिससे राज्य सरकारों को अतिरिक्त बिक्री कर लगाने की मौजूदा शक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने बाल श्रम (संशोधन) अधिनियम 2016 के कार्यान्वयन हेतु विशेष प्रकोष्ठ बनाने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के पूर्ण कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु केंद्र को विशेष प्रकोष्ठ गठित करने का आदेश दिया। यह निर्देश जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने दिया, जिसमें महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश जारी करने को कहा गया। पीठ ने स्पष्ट किया कि विशेष प्रकोष्ठ का कार्य बाल श्रम संशोधन अधिनियम 2016 के प्रविधानों की निगरानी करना होगा, विशेषकर खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करना। इस अधिनियम ने 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सभी व्यवसायों में कार्यस्थल से दूर रखने का प्रावधान किया है और मूल बाल श्रम अधिनियम 1986 में व्यापक संशोधन किया। याचिकाकर्ता, गैर-सरकारी संगठन हेल्थ फोर मिलियन्स, के अधिवक्ता प्रशांत भूषण और प्रणव सचदेव ने इस मामले को अदालत में लाया, जिसमें उन्होंने बाल श्रमिकों के लिए शिक्षा सुविधाएं और दिन में दो बार भोजन उपलब्ध कराने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान केंद्र के वकील ने बताया कि मूल अधिनियम में संशोधन के बाद अधिकांश शिकायतें निपट गई हैं, इसलिए रिट याचिका पर आगे विचार नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में मांगी गई अतिरिक्त मांगों को खारिज करते हुए कहा कि संशोधन अधिनियम के तहत किए गए बदलावों को पूरी तरह प्रभावी करना शेष है। इस निर्णय के बाद, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को राज्यों के मुख्य सचिवों के सहयोग से प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश जारी करने और विशेष प्रकोष्ठ की निगरानी को सुदृढ़ करने का कार्य सौंपा गया। यह कदम बाल श्रम के निरोध में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रगति दर्शाता है, जिससे न केवल खतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिकों की भर्ती पर रोक लगेगी, बल्कि मौजूदा नियमों की प्रभावी निगरानी भी सुनिश्चित होगी। भविष्य में विशेष प्रकोष्ठ के कार्यों के आधार पर बाल श्रम के उल्लंघन के मामलों में तेज़ी से कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है, जिससे बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा में सुधार होगा।

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केरल में सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दो करोड़ रिश्वत मामले में जांच आदेश

केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगभग दो दशक पुराने दो करोड़ रुपये की रिश्वत के आरोप में विजिलेंस एंड एंटी‑करप्शन ब्यूरो (वीएसीबी) को प्रारंभिक जांच करने का निर्देश दिया। यह आदेश डिजिटल डेस्क, तिरुअनंतपुरम से जारी किया गया है। शिकायतकर्ता और पूर्व ठेकेदार वी.ओ. साजन का कहना है कि जब ज्ञानेश कुमार केरल राज्य लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के सचिव थे, तब उन्होंने केएसटीपी (केरल राज्य सड़क परिवहन परियोजना) के तहत मलेशियाई कंपनी पाटी‑बेल के लगभग सत्रह करोड़ रुपये के स्वीकृत बिलों के भुगतान को जानबूझकर रोक दिया। इस रोक के बदले दो करोड़ रुपये की रिश्वत की मांग की गई, जिसका दावा साजन ने शिकायत में किया। शिकायत में यह भी बताया गया है कि भुगतान में देरी और रिश्वत की मांग के कारण कंपनी के मलेशियाई प्रोजेक्ट इंजीनियर ली सी बीन ने 2006 में आत्महत्या कर ली। इस मामले की पहले भी जांच हुई थी, पर बाद में उसे बंद कर दिया गया था। अब, जब देश भर में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं, तब इस मामले की नई जांच का आदेश आया है। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17(ए) के तहत यह जांच मुख्यमंत्री से परामर्श और कानूनी राय के बाद मंजूर की गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुसार, सीईसी के वर्तमान पद पर रहने से उनके पूर्व कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों की जांच पर कोई रोक नहीं लगती। वर्तमान में सीईसी ज्ञानेश कुमार ने इन आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं की है। यदि जांच के परिणामस्वरूप आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह केस न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि चुनाव आयोग की कार्यवाही की पारदर्शिता पर भी प्रश्न उठाएगा। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक विश्वास को पुनर्स्थापित करने के लिए आयोग को अतिरिक्त पारदर्शी उपाय अपनाने की आवश्यकता पड़ सकती है।

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₹14,500 करोड़ की VGF स्कीम से 92 गीगावाट‑घंटा ग्रिड‑स्केल एनर्जी स्टोरेज क्षमता विकसित

केंद्रीय कैबिनेट ने नवीकरणीय ऊर्जा के बड़े पैमाने पर एकीकरण को तेज करने के उद्देश्य से 14,500 करोड़ रुपये की वाइबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) स्कीम को मंजूरी दी। इस योजना के अंतर्गत 92 गीगावाट‑घंटा (GW‑h) की ग्रिड‑स्केल एनर्जी स्टोरेज क्षमता विकसित की जाएगी, जो 2030‑31 तक पाँच वर्ष चलने वाली है। स्कीम के तहत 30 GW‑h बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS), 60 GW‑h पंपड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स और 2 GW‑h उभरती हुई स्टोरेज तकनीकों को समर्थन मिलेगा। कुल अनुमानित निवेश 97,600 करोड़ रुपये है, और क्षमता का आवंटन टैरिफ‑आधारित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया से किया जाएगा। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनियाँ BESS व हाइड्रो पीएसपी प्रोजेक्ट्स के लिए VGF सहायता प्राप्त कर सकती हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि इस योजना से देश की मौजूदा ग्रिड‑स्केल एनर्जी स्टोरेज क्षमता के 170 % के बराबर नई क्षमता सृजित होगी और 2031‑32 तक 411 GW‑h की आवश्यकता को पूरा करने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी बताया कि स्कीम से बिजली क्षेत्र के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती मिलेगी, नवीकरणीय ऊर्जा का बड़े पैमाने पर एकीकरण आसान होगा और विश्वसनीय, सस्ती तथा चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित होगी। इसके अलावा, कैबिनेट ने 2,814 करोड़ रुपये की लागत से दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण की व्यवस्था से संबंधित एक प्रस्ताव को भी मंजूरी दी। इस निर्णय से क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग को देश में लाया जा सकेगा, जिससे भू‑राजनीतिक व्यवधान, मूल्य अस्थिरता और आपूर्ति प्रतिबंधों के जोखिम को कम किया जा सकेगा। इन दोनों निर्णयों का उद्देश्य घरेलू एनर्जी स्टोरेज मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूत करना और स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देना है। BESS प्रोजेक्ट्स में न्यूनतम 40 % घरेलू उपकरण की बाध्यता लागू होगी, जिससे भारतीय उद्योग को अवसर मिलेगा और बैटरी निर्माण के लिए चल रही सप्लाई‑साइड प्रोत्साहन योजनाओं को बल मिलेगा।

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